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अंकित श्रीवास्तव

मैं मुनक्कश (अंकित) हूं तेरी रूह के दरवाजों पर
तू मिटा सकता नहीं भूलने वाले मुझको।

नज़दीक बहुत गर रहे, बन जाओगे आदत

ये सोच के, मिलने तुम्हें अक्सर नहीं आते

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